जे.आर.डी. टाटा: 121वीं जयंती पर एक प्रेरक सफर
29 जुलाई 2025 को भारत के महान उद्योगपति और दूरदर्शी नेता जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा) की 121वीं जयंती मनाई जा रही है। वे सिर्फ एक उद्योगपति नहीं थे, बल्कि ऐसे इंसान थे जिन्होंने भारतीय उद्योग, विज्ञान, सामाजिक सोच और विमानन जगत को नई दिशा दी। आज भी उनकी सोच, मेहनत और सादगी हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
प्रारंभिक जीवन और उड़ानों का सपना
जे.आर.डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई 1904 को पेरिस में हुआ था। बचपन से ही उन्हें उड़ानों का जुनून था। यह वही जुनून था जिसने आगे चलकर उन्हें भारत का पहला लाइसेंसधारी पायलट बना दिया। 1929 में उन्होंने पायलट लाइसेंस हासिल किया और 1932 में टाटा एयरलाइंस की शुरुआत की, जो आगे चलकर एयर इंडिया के रूप में जानी गई। उन्हें आज भी “भारतीय विमानन का पिता” कहा जाता है।
टाटा समूह का सुनहरा दौर
1938 में, केवल 34 साल की उम्र में, वे टाटा संस के चेयरमैन बने। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने अभूतपूर्व विकास किया। उनके समय में टाटा ने केवल उद्योग नहीं खड़े किए, बल्कि भारत के विकास का नया नक्शा तैयार किया।
उन्होंने टाटा मोटर्स, टाटा ग्लोबल बेवरेजेस, टाटा सॉल्ट, टाइटन, वोल्टास जैसी कई कंपनियों को शुरू किया। 50 साल के कार्यकाल में टाटा समूह का कारोबार 50 गुना बढ़ गया।
जयंती पर याद किए गए प्रेरक किस्से
जे.आर.डी. टाटा की जयंती के मौके पर उनके कई किस्से दोबारा चर्चा में हैं।
एक बार वे दार्जिलिंग के दौरे पर गए। वहां ठंड इतनी ज्यादा थी कि कमरे में ही जमने की नौबत थी। उन्होंने किसी बड़े इंतजाम की बजाय अपने कपड़ों के अंदर अखबार की तहें डालकर खुद को गर्म रखा। यह उनके सादे स्वभाव और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व को दर्शाता है।
एक और प्रेरक घटना है सुधा मूर्ति का पत्र। जब टाटा मोटर्स में महिला इंजीनियरों की भर्ती नहीं होती थी, तब सुधा मूर्ति ने उन्हें एक पत्र लिखा। इस पत्र के बाद जे.आर.डी. ने तुरंत नियम बदला और महिलाओं के लिए नए अवसर खोले।
समाज के प्रति उनकी सोच
जे.आर.डी. टाटा ने हमेशा उद्योग को देश की सेवा का माध्यम माना। वे मानते थे कि “कंपनी का असली मुनाफा तब है जब वह समाज को कुछ लौटाए।”
उन्होंने कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षा योजनाएं शुरू कीं। उनके फैसलों से टाटा समूह सिर्फ एक व्यापारिक घराना नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक संस्थान बन गया।
जमशेदपुर में खेलों के माध्यम से श्रद्धांजलि
इस बार उनकी जयंती पर जमशेदपुर के केरला पब्लिक स्कूल में बास्केटबॉल टूर्नामेंट आयोजित किया गया। इसका मकसद खेलों के जरिए युवा पीढ़ी को उनकी सोच और मूल्यों से जोड़ना था।
पुरस्कार और सम्मान
उनके अद्भुत योगदान के लिए उन्हें 1955 में पद्म विभूषण और 1992 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। यह सम्मान सिर्फ उद्योग के लिए नहीं, बल्कि उनकी मानवीय सोच और दूरदृष्टि के लिए था।
विरासत जो हमेशा जिंदा रहेगी
जे.आर.डी. टाटा ने सिर्फ कंपनियां नहीं बनाईं, उन्होंने एक ऐसा विचार दिया कि भारत भी वैश्विक स्तर पर खड़ा हो सकता है। उनकी सोच ने यह साबित किया कि जब व्यापार में ईमानदारी और देशहित का भाव हो, तब वह समाज को बदल सकता है।
आज, उनकी 121वीं जयंती पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह महसूस होता है कि उनका सफर सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीती-जागती प्रेरणा है।
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निष्कर्ष:
जे.आर.डी. टाटा का जीवन यह सिखाता है कि सादगी, ईमानदारी और दूरदर्शिता के बल पर कोई भी इंसान दुनिया में बदलाव ला सकता है। उनका नाम सिर्फ टाटा समूह का चेहरा नहीं, बल्कि भारत की प्रगति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है।