कभी भारतीय कारोबारी जगत का सबसे चमकता सितारा माने जाने वाले अनिल अंबानी आज एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह गर्व की नहीं बल्कि गहरी चिंता की है। देश की आर्थिक अपराध शाखा प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उनके साम्राज्य पर एक बार फिर शिकंजा कस दिया है। इस कार्रवाई ने न सिर्फ बाजार को हिला कर रख दिया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है – क्या यह सिर्फ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला है या इसके पीछे कोई गहरी कहानी छिपी है?
🔍 मामला क्या है?
24 जुलाई 2025 को, जैसे ही देश ने सुबह की चाय का प्याला उठाया, समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफार्मों पर एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ छा गई – “अनिल अंबानी के ठिकानों पर ED का छापा।”
सूत्रों के अनुसार, यह छापेमारी ₹3,000 करोड़ के Yes Bank लोन फ्रॉड मामले में की गई। यह लोन कथित रूप से उन कंपनियों को दिया गया था जो Reliance Anil Dhirubhai Ambani Group (RADAG) से जुड़ी थीं।
ईडी ने 35 से अधिक स्थानों पर रेड मारी, जिनमें कंपनी ऑफिस, डायरेक्टरों के घर और सहयोगी संस्थाएं शामिल थीं। जांच एजेंसी का कहना है कि लोन लेने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ और फंड को दूसरी शेल कंपनियों में घुमा-फिराकर छिपाया गया।
बड़ा खुलासा: ₹14,000 करोड़ की गड़बड़ी
मामला सिर्फ ₹3,000 करोड़ तक सीमित नहीं रहा। जांच में पता चला कि Reliance Communications और उससे जुड़ी अन्य इकाइयों पर कुल मिलाकर ₹14,000 करोड़ तक के बैंक लोन फ्रॉड का आरोप है।
यह वही RCom है जिसने कभी भारत में मोबाइल क्रांति की शुरुआत की थी। लेकिन आज वही कंपनी दिवालिया हो चुकी है, और अब उस पर करोड़ों के गबन का ठप्पा लग गया है।
शेयर बाजार में हड़कंप
जैसे ही यह खबर सामने आई, बाजार ने तुरंत प्रतिक्रिया दी।
Reliance Infrastructure और Reliance Power जैसी कंपनियों के शेयरों में 4 से 5 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों का भरोसा हिल गया, और बाजार में बेचैनी की लहर दौड़ गई।
हालांकि, कंपनी की ओर से एक बयान जारी किया गया जिसमें कहा गया कि “जांच चल रही है, और हम पूरा सहयोग दे रहे हैं। यह पुराने मामलों से जुड़ी प्रक्रिया है जिसका कंपनी के मौजूदा संचालन से कोई संबंध नहीं है।”
कानूनी पेचीदगियाँ और अन्य एजेंसियाँ: गहराते जाल में अनिल अंबानी
अनिल अंबानी की कंपनियों के खिलाफ जो कार्रवाई हुई है, वह कोई साधारण छानबीन नहीं है — यह कानूनी और नियामक संस्थाओं का एक समन्वित अभियान है, जिसमें कई मोर्चों से हमला बोला गया है।
इस मामले में सिर्फ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ही नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसियाँ शामिल हैं — और हर संस्था अपनी भूमिका में बेहद सक्रिय दिखाई दे रही है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED)
ED की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चित है क्योंकि यह एजेंसी आर्थिक अपराधों, खासकर मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों की जांच करती है।
अनिल अंबानी ग्रुप पर आरोप है कि उन्होंने YES बैंक से मिले ₹3,000 करोड़ के कर्ज को फर्जी कंपनियों के ज़रिए इधर-उधर घुमाकर गैरकानूनी ढंग से इस्तेमाल किया।
ED को शक है कि इस पैसे का इस्तेमाल न केवल व्यापारिक घाटों को छिपाने में किया गया, बल्कि इसका हिस्सा व्यक्तिगत लाभ और राजनीतिक संपर्कों को मजबूत करने में भी लगाया गया।
इस जांच के दौरान ED ने 50 से अधिक कंपनियों, 25+ व्यक्तियों और सैकड़ों बैंक ट्रांजेक्शन की गहनता से छानबीन की है।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
CBI ने इस मामले में दो एफआईआर दर्ज की हैं।
इनमें से एक मामला Reliance Home Finance Ltd. (RHFL) और दूसरा Reliance Commercial Finance Ltd. (RCFL) से जुड़ा हुआ है।
CBI का आरोप है कि इन फर्मों ने जानबूझकर ऐसे कर्ज बांटे जिन्हें कभी वापस नहीं आना था — और यह सब कुछ अंदरूनी सांठगांठ और नियोजित तरीके से हुआ।
इन कर्जों को “evergreening” की प्रक्रिया से छिपाया गया — यानी एक लोन को चुकाने के लिए दूसरा लोन दिया गया ताकि नकली बैलेंस शीट बनाई जा सके।
यह एक प्रकार का धोखा है, जो बैंकों और निवेशकों दोनों के साथ किया गया।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)
SEBI इस मामले में नियामक उल्लंघनों की जांच कर रहा है।
शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों के पास कुछ नियम होते हैं — जैसे कि पारदर्शिता बनाए रखना, समय पर ऑडिट रिपोर्ट देना, और निवेशकों को गुमराह न करना।
SEBI ने पाया कि Reliance Capital और उससे जुड़ी अन्य कंपनियों ने सूचना छुपाई, ऑडिट डेटा में फेरबदल किया, और अपने निवेशकों के साथ अनुचित व्यवहार किया।
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और अन्य बैंक
SBI, जो देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक बैंक है, उसने जून 2025 में Reliance Communications को “fraudulent borrower” घोषित कर दिया।
यह फैसला छोटे-मोटे सबूतों पर नहीं, बल्कि महीनों की जांच और वित्तीय विश्लेषण के बाद लिया गया।
SBI के इस कदम ने मामले को नई दिशा दे दी, क्योंकि जब एक सरकारी बैंक किसी को धोखेबाज़ कहे, तो बाकी बैंक भी सतर्क हो जाते हैं।
इसके अलावा Bank of Baroda, PNB, और अन्य निजी बैंक भी अब इस मामले की आंतरिक समीक्षा कर रहे हैं, क्योंकि इन सभी ने भी कभी न कभी RADAG की कंपनियों को लोन दिया था।
राष्ट्रीय आवास बैंक (NHB) और NFRA
NHB और NFRA जैसी संस्थाएं जो वित्तीय प्रणाली की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए काम करती हैं, वे भी अब इस जांच में शामिल हो चुकी हैं।
NFRA यानी National Financial Reporting Authority यह देख रही है कि कंपनी के अकाउंटिंग स्टैंडर्ड में कहीं किसी तरह की हेराफेरी या “creative accounting” तो नहीं की गई।
कुल मिलाकर
यह मामला एक कॉरपोरेट धोखाधड़ी से बढ़कर एक संपूर्ण प्रणालीगत विफलता का प्रतीक बनता जा रहा है।
अनिल अंबानी और उनकी कंपनियाँ अब देश की सात प्रमुख जांच एजेंसियों के घेरे में हैं, जिनमें ED, CBI, SEBI, SBI, NHB, NFRA और बैंकिंग ऑथोरिटीज़ शामिल हैं।
यह कानूनी पेचीदगियाँ दिखाती हैं कि भारत में अब कॉरपोरेट गड़बड़ियों को हल्के में नहीं लिया जा रहा।
अगर ये आरोप साबित होते हैं, तो यह न केवल अनिल अंबानी के लिए बल्कि पूरे कॉरपोरेट भारत के लिए एक चेतावनी होगी।
क्या आगे बच पाएंगे अनिल?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है – क्या अनिल अंबानी इन कानूनी संकटों से बाहर निकल पाएंगे?
कंपनी कह रही है कि वह पूरी तरह जांच में सहयोग कर रही है। लेकिन जब मामले इतने बड़े हों और सरकारी एजेंसियाँ इतनी सक्रिय हों, तो रास्ता आसान नहीं होता।
अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो यह देश के कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाइयों में से एक बन सकती है। और अगर यह आरोप झूठे साबित होते हैं, तो यह भारतीय बिजनेस सिस्टम की पारदर्शिता और एजेंसियों की जवाबदेही पर सवाल उठा सकते हैं।
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